मुकदमा दर्ज करने के लिए पीएम रिपोर्ट का इन्तजार कर रही पलिया पुलिस
पीड़ित लगा रहा पुलिस और नेताओं के चक्कर, दस दिन के बाद भी नहीं दर्ज हुआ मुकदमा

मुकदमा दर्ज करने के लिए पीएम रिपोर्ट का इन्तजार कर रही पलिया पुलिस
पीड़ित लगा रहा पुलिस और नेताओं के चक्कर, दस दिन के बाद भी नहीं दर्ज हुआ मुकदमा

(निर्जेश मिश्र ‘‘सम्पादक’’)
पलियाकलां-खीरी। मित्रों आज से लगभग दस दिन पूर्व 23 नवम्बर को पलिया नगर की पटिहन रोड पर स्थित मोहल्ला कृष्णानगर निवासी गोविन्द गुप्ता पुत्र सरजू प्रसाद गुप्ता की पत्नी प्रीति गुप्ता की जहरीला पदार्थ खाने से मौत हो गयी थी। मृतका के भाई पवन गुप्ता ने कोतवाली पुलिस को प्रार्थना पत्र देकर ससुरालियों पर अपनी बहन को जहर देकर मारने का आरोप लगाया था। पीड़ित पक्ष ने गोविन्द गुप्ता व दीप गुप्ता पुत्रगण सरजू प्रसाद गुप्ता के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई करने की मांग की थी। हालांकि अभी तक पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया है। बीते रविवार को मृतका प्रीति के पिता आनन्दपाल गुप्ता ने पूरनपुर के भाजपा विधायक बाबूराम पासवान से मिलकर अपना दुखड़ा सुनाते हुए मदद की गुहार लगाई। विधायक ने एसपी खीरी से फोन पर वार्ता कर पूरे मामले से अवगत कराया। इस पर एसपी खीरी गणेश प्रसाद साहा ने पलिया प्रभारी निरीक्षक को मुकदमा दर्ज करने का आदेश भी दिया, लेकिन कोतवाली पुलिस ने अभी तक मुकदमा दर्ज नहीं किया। इस सम्बन्ध में जानकारी लेने पर पलिया प्रभारी निरीक्षक विवेक उपाध्याय ने बताया कि महिला प्रीति गुप्ता की मौत का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका। डॉक्टर द्वारा विसरा प्रिजर्व किया गया था, जिसे जांच के लिए लखनऊ भेजा गया है। मौत का कारण स्पष्ट होने पर कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि हमारे उत्तर प्रदेश की पुलिस एक ही जैसे अलग-अलग मामलों में कार्रवाई भी अलग-अलग ढंग से ही करती है। कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनमें पुलिस पलक झपकते ही मुकदमा दर्ज कर लेती है। परन्तु कुछ प्रकरण ऐसे होते हैं, जिनमें सम्भवतः राजनैतिक या फिर अन्य किसी दबाव के कारण पुलिस हफ्तों तक मुकदमा दर्ज नहीं करती। पीड़ित लगातार पुलिस और नेताओं के चक्कर लगाते रहते हैं। प्रीति गुप्ता की मौत के मामले में भी ऐसा ही कुछ चल रहा है, जिस कारण आज तक मुकदमा दर्ज नहीं हो सका। पुलिस क्षेत्राधिकारी अरविन्द वर्मा का कहना है कि मामला हमारे संज्ञान में नहीं है और न ही हमारे कोई आया है। पीड़ित को हमारे पास भेजिए, तभी कोई कार्रवाई संभव हो सकेगी। अब तो मीडियाकर्मियों को अधिकारियों का पक्ष जानना भी बड़ा मुश्किल काम हो गया है, क्योंकि समाचार के उद्देश्य से किसी मामले से सम्बन्धित यदि जानकारी ली जाती है, तो सम्बन्धित अधिकारी मीडियाकर्मी को ही पीड़ित का सहयोगी बना देते हैं।





