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फगुनी स्कूल जाने के लिए तैयार हो गई थी। फगुनी यानी कि फाल्गुनी। हरिराम की ज्येष्ठ पुत्री थी। प्यार से सब उसे फगुनी कहते थे। गांव में वैसे भी नाम आसान बनाकर पुकारने का रिवाज था। वैसे एक दो साल में स्कूल पूरा ही होने वाला था। फगुनी का मन था कि दूसरे कस्बे में जाकर आगे की पढ़ाई करे। इस गाँव में लड़कियों की पढ़ाई के लिए स्कूल से आगे कोई व्यवस्था नहीं थी। मुझे यह बात मालूम थी। हालांकि उसने सिर्फ दबे शब्दों में एकाध बार अपने मन की बात कहने की कोशिश की थी, अपने पिता के सामने। लेकिन मैंने पूरे जतन से उसकी बात दबा दी थी, बिना जाहिर करे। आखिर सौतेली मां जो ठहरी।पूरी होशियारी के साथ जिससे मैं उसके और उसके पिता के समक्ष शुभचिंतक भी बनी रहूं और मेरा काम भी पूरा हो जाए।

फगुनी बहुत सीधी सादी थी, बेहद मासूम और अंतर्मुखी। मेरी चालाकियां कहां समझ पाती थी।और उसकी छोटी बहन सगुनी, वह तो मेरी चालाकियां समझने के लिहाज से बहुत छोटी थी। उसके पिता यानि कि मेरे पति, हरिराम बाबू, वह तो मेरे बिलकुल कहे में थे। उन्हें मुझपर पूर्ण और अंधविश्वास करते थे कि बच्चियों के विषय में मुझसे बेहतर कोई सोच ही नहीं सकता।

छोटा सा मध्यमवर्गीय परिवार था हमारा। मेरे पति हरिराम की गांव में हलवाई की दुकान थी। दुकान अच्छी चलती थी।बहुत ज्यादा रईसी नहीं थी तो खाने पहनने की कोई कमी भी ना थी। मैं हरिराम की दूसरी पत्नी थी। पहली पत्नी विमला का देहांत तभी हो गया था जब यह दोनों बच्चियां छोटी थी।

मैंने उनके कान भर भर कर यह बात अच्छे से उनके मन में बैठा दी थी कि अब फगुनी को आगे पढ़ाई करने की कोई जरूरत नहीं। अब कोई अच्छा सा रिश्ता देखकर उसका ब्याह कर देना चाहिए।

संयोग से एक दो जान पहचान वालों ने एक कुछेक रिश्ते सुझाए थे। मगर ईमानदारी से कहूं तो वह फगुनी के लिए कतई सही नहीं थे। एक तो लड़के की और फगुनी की उम्र में बहुत अंतर था दूसरे लड़का कुछ काम धाम भी नहीं करता था। लेकिन मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रही थी हरिराम को इस रिश्ते के लिए मनाने की। मुझे कहां मंजूर था कि वह आगे पढ़े, जिंदगी में कुछ बने। मैं भी कहां बन पाई थी सपने तो मेरे भी बहुत थे। मगर कहां चली थी भइया भाभी के आगे मेरी। अंदर ही अंदर घुट कर रह गई थी सब इच्छाएं मेरी। इसीलिए शायद मेरे अदर इस प्रतिशोध ने जन्म ले लिया था।

फगुनी के लिए अच्छे रिश्ते न आने की एक वजह तो यह थी कि उसका रंग भी दबा हुआ था और नैन नक्श भी खास सुंदर न थे। दूसरे हरिराम उसके ब्याह में एक धेला भी ख़र्च करने के इच्छुक न थे। क्योंकि यह बात मैंने उन्हें अच्छे से समझा दी थी कि इससे कोई फायदा नहीं और यह बात पूरे गाँव में फैल चुकी थी। और उसकी उम्र भी तो ब्याह लायक नहीं हुई थी। शायद कुछ रुककर उसके लिए अच्छे रिश्ते ढ़ूढ़ते तो बात बनती। मगर हरिराम तो मेरे कहे अनुसार बिलकुल मेहनत करने को तैयार नहीं थे।
आगे की कहानी कल इसी समय प्रस्तुत की जायेगी पेज पर बने रहें ।


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