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उत्तर प्रदेश

27 साल पूर्व बन्द हुई थी कोयले से चलने वाली स्टीम ट्रेन

- जनवरी 1996 तक भाप के इंजन से चलने वाली सवारी गाड़ी ने दी देश की जनता को सेवा

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27 साल पूर्व बन्द हुई थी कोयले से चलने वाली स्टीम ट्रेन

– जनवरी 1996 तक भाप के इंजन से चलने वाली सवारी गाड़ी ने दी देश की जनता को सेवा

(निर्जेश मिश्र “सम्पादक”)

विशेष रिपोर्ट, सावधान इण्डिया न्यूज। मित्रों आज से लगभग 27 साल पूर्व वर्ष 1996 में बन्द हुई यह स्टीम ट्रेन आज के युग में केवल यादगार बनकर रह गयी है। क्या जमाना था जब पटरियों पर छुक-छुक करता यह भाप का इंजन दौड़ता हुआ बहुत सुहाना और प्यारा लगता था। फिलहाल अभी यह भाप का इंजन देखने को मिल जाता है। बरेली, लखनऊ, मुजफ्फरपुर एवं गोरखपुर सहित देश के प्रमुख रेलवे स्टशनों व मण्डल कार्यालयों में यह इंजन सहेजकर रखे गये हैं। रेलवे विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार स्टीम इंजन की ट्रेन ने वर्ष 1995 तक इस देश की जनता को सेवा दी। उसके बाद वर्ष 1996 के माह जनवरी में यह स्टीम ट्रेन पूरी तरह से बन्द कर दी गयी थी। अब नई पीढ़ी तो सिर्फ और सिर्फ इस स्टीम ट्रेन को पुरानी फिल्मों, कागजों एवं सोशल मीडिया पर देखकर ही विभिन्न प्रकार की कल्पनाएं कर सकती है। पलिया नगर की निवासी सुशीला देवी बताती हैं कि उनका घर रेलवे स्टेशन के पास में ही है। स्टीम ट्रेन जब पटरियों से गुजरती थी, तब वह अपने मकान की छत से कोयले से चलने वाली ट्रेन को देखती थीं। उस जमाने में स्टीम ट्रेन को देखने एवं इसकी छुक-छुक वाली ध्वनि सुनने में बड़ा आनन्द आता था। पलिया नगर के ही सन्तोष गुप्ता बताते हैं कि क्या बचपन था जब छुक-छुक करती स्टीम ट्रेन पर सवार होते थे। बचपन में वह पलिया से गोलागोकर्णनाथ पढ़ने के लिए स्टीम ट्रेन से ही स्कूल आते-जाते थे। बड़ा आनन्द आता था स्टीम ट्रेन की सवारी करने में। पीलीभीत जिले की पूरनपुर तहसील क्षेत्र के ग्राम रसूलापुर निवासी 61 वर्षीय बलराम सिंह का कहना है कि उन्होंने कोयले से चलने वाली गाड़ी से खूब यात्रा की है। कुर्रैया से पूरनपुर जाने के लिए मात्र 60 पैसे का टिकट मिलता था। बताया कि ट्रेन तो ठीक थी, लेकिन आज के समय में चलने वाली ट्रेनें सुविधाओं से युक्त हैं। कोयले वाली ट्रेन में हिचकोले बहुत लगते थे और यदि गेट से बाहर झांककर देख लेते थे तो पूरा मुंह कोयले से काला हो जाता था। ग्राम सपहा निवासी रामसुरेन्द्र मिश्रा बताते हैं कि सुविधाएं तो आज की ही ट्रेन में अच्छी हैं। परन्तु कोयले वाली ट्रेनों में यह एक अच्छी बात थी कि ट्रेन स्टेशन से चलने लगती थी, तब भी उस पर दौड़कर चढ़ा जा सकता था। बताया कि वह सन 1968 में जब स्कूल में पढ़ने जाते थे, उस समय हमारे शिक्षक स्कूल से तब चलते थे, जब ट्रेन स्टेशन पर पहुंच जाती थी। उसके बाद भी वह ट्रेन पर आसानी से बैठ जाते थे। एक बार तो उनके शिक्षक से किसी ने 15 किलो चना लेकर ट्रेन पर बैठने की शर्त लगा दी। उस जमाने में वह 15 किलो चना लेकर स्कूल से दौड़कर ट्रेन पर सवार हो गये थे। उन्होंने बताया कि कोयले से वाली ट्रेन से खतरा भी रहता था। आए दिन इंजन से निकला कोयला आसपास के लोगों के छप्परों पर गिर जाता था, जिससे आग भी लगने की सम्भावना प्रबल रहती थी। कुल मिलाकर रामसुरेन्द्र मिश्रा का कहना यह है कि आज की ट्रेन सबसे अच्छी और अत्यन्त सुविधाजनक है। इसी गांव के रहने वाले ओमप्रकाश मिश्रा का भी यही कहना है कि पहले वाली ट्रेनों से आज के जमाने की ट्रेनें बेहतर हैं। उन्होंने बताया कि इन ट्रेनों से समय की बचत होने के साथ-साथ सुविधाएं भी अच्छी हैं। कुर्रैया स्टेशन से बरेली जाने में कम से कम आठ घंटे का समय लगता था। सुबह आठ बजे ट्रेन पर सवार होते थे, तब कहीं जाकर शाम को चार बजे बरेली पहुंचते थे और आज बरेली से शाम तक वापसी भी हो जाती है।

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