ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ , हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते
ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ , हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते



ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ , हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते —————————— यह मुहावरा नही दर्द है मुसाफिर का जो सरसराती रातों मे एक चिंगारी की आस लगाए बैठा है ——————– मामला उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर खीरी के पलिया कलां का है ।जहाँ रात में दूर दराज से आने वाले मुसाफिरों को अलाव तक मयस्सर नही हो रहा । पूछते है नगरवासी कि कहाँ है नगर पालिका जो भारी भरकम योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए प्रति माह बोर्ड मीटिंग कर हजारों रूपए चाय नाश्ते पर खर्च करता है क्या अब उसके पास चंद लकड़ियाँ खरीदने का भी पैसा नही बचा । और कहाँ गयी नगर की तमाम समाज सेवी संस्थाएं जो समाज सेवा का दम्भ भरती है क्या इंतजार है किसी मौत का या फिर राह चलते किसी फकीर को चंद रुपयों की चादर ओढ़ाकर शोशल मीडिया पर दस लोगों के साथ मे खींची गयी फोटो शेयर कर वाह वाही लूटना ही संस्थाओं का उद्देश्य है। कहाँ है गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले मंत्री विधायक क्या ये लोग इतने गरीब हो गये है की एक अलाव की व्यवस्था तक न करा सके या फिर चुनाव नजदीक आने पर ही ढोंग किया जाता है।







