एक बार भूपति मन माहीं, भए गलानि मोरे सुत नहीं…
एक बार भूपति मन माहीं, भए गलानि मोरे सुत नहीं...

एक बार भूपति मन माहीं, भए गलानि मोरे सुत नहीं…

गोलागोकर्णनाथ-खीरी। एक बार भूपति मन माहीं। भए गलानि मोरे सुत नाहीं।। ग्राम बिजोरिया में चल रही राम कथा के तीसरे दिन कथा व्यास शिवप्रकाश मिश्रा ने श्रोताओं को श्रीराम जन्म की सुन्दर कथा का श्रवण कराया।
उन्होंने कहा कि एक बार राजा दशरथ को बडी ही चिन्ता हुई कि हमारे कोई पुत्र नहीं है। यह सोचकर महाराज दशरथ बहुत ग्लानि हुई और वह गुरू वशिष्ठ जी के पास पहुंच गए। उन्होंने गुरू जी को अपनी व्यथा सुनाते हुए पुत्र प्राप्ति की इच्छा प्रकट की। गुरू वशिष्ठ ने कहा कि हे राजन तुम श्रृंगी ऋषि को बुलाकर पुत्रेष्ठि यज्ञ का अनुष्ठान कराआ। इससे आपको निश्चित रूप से पुत्र की प्राप्ति होगी। महाराजा दशरथ ने श्रृंगी ऋषि को बुलाकर विधिपूर्वक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया। अग्नि देव खीर का प्रसाद लेकर प्रकट हुए। उस प्रसाद को कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा तीनों महारानियों में बांट दिया। प्रसाद ग्रहण करने से कौशल्या मां से श्रीराम, महारानी कैकई से भरत और महारानी सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न प्रकट हुए। धूमधाम के साथ में श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया गया। भगवान श्रीराम की पावन कथा सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे।








