डिग्री कालेज के 11 सौ छात्रों का भविष्य मात्र दो प्रवक्ताओं के हाथों में
डिग्री कालेज के 11 सौ छात्रों का भविष्य मात्र दो प्रवक्ताओं के हाथों में

डिग्री कालेज के 11 सौ छात्रों का भविष्य मात्र दो प्रवक्ताओं के हाथों में

(निर्जेश मिश्र)
लखीमपुर-खीरी। जिले का इकलौता राजकीय महाविद्यालय जो कि तहसील पलिया कलां में स्थित है। यह पूर्ण रूप से उपेक्षा का शिकार हो रहा है। इस महाविद्यालय में सात विषयों पर शिक्षण कार्य होता है, जिनका उत्तरदायित्व मात्र दो प्रवक्ता ही निभा रहे हैं, जबकि यहां एक हजार से भी अधिक छात्र/छात्राओं का पंजीकरण है। लगभग ग्यारह सौ छात्रों का भविष्य प्रवक्ता डाक्टर वसीम और डाक्टर सूर्यप्रकाश शुक्ला के हाथों में है। महाविद्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां दस प्रवक्ताओं की तैनाती होनी चाहिए। अब सोचिए कि कहां दस और कहां दो प्रवक्ता। कितना बड़ा अन्तर है। सोचनीय विषय यह है कि जो कार्य दस लोगों के बराबर हो उसे मात्र दो लोग कैसे पूरा कर सकते हैं। कहने को तो लखीमपुर जिले में दो सांसद, एक मन्त्री और आठ विधायक हैं, परन्तु आज तक डिग्री कालेज की दुर्दशा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसे लखीमपुर जिले का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे। पलिया के इस डिग्री कालेज में शिक्षण स्टाफ का आगमन तो नहीं हुआ, लेकिन जो यहां कार्यरत थे उनका स्थानान्तरण जरूर हो गया। लगभग दस सालों से प्रचार्य की कुर्सी खाली है, जिसका निर्वहन प्रभारी प्राचार्य के रूप में सूर्यप्रकाश शुक्ला कर रहे हैं। इसके अलावा महाविद्यालय परिसर में स्नातकोत्तर भवन का भी निर्माण लगभग पांच वर्ष पूर्व हो गया था, परन्तु आज तक एमए की कक्षाओं का शुभारम्भ नहीं हो सका। जानकारी लेने पर ज्ञात हुआ कि एमए क्लासेस के लिए अभी तक सम्बद्धता ही नहीं हो सकी। अब चुनाव की नजदीकियां बढ़ने लगी हैं। फिर से लम्बे-लम्बे वादे करने वाले नेता जनता को विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देंगे। चुनाव होने के बाद फिर वही स्थित हो जाएगी, जो पूर्व में रहती चली आ रही है। केवल फ्री अनाज देने मात्र से ही जनता का भला नहीं होने वाला। जीवन जीने के लिए जनता का शिक्षित होना भी नितान्त आवश्यक है और यह तभी सम्भव हो सकेगा, जब राजकीय विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य चुस्त-दुरुस्त होगा। क्योंकि समाज का हर वह व्यक्ति प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को शिक्षित नहीं करा सकता, जो वास्तव में आर्थिक स्थिति से काफी कमजोर हैं और सरकार द्वारा दिये जा रहे मुफ्त अनाज के सहारे अपना और अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहा है।







