जंगल की सुरक्षा के साथ-साथ वन विभाग को मिला मालिकाना हक
दुधवा जंगल में मजदूरी के बदले मजदूरों को दी जा रही जंगल की बेशकीमती लकड़ी

जंगल की सुरक्षा के साथ-साथ वन विभाग को मिला मालिकाना हक
– दुधवा जंगल में मजदूरी के बदले मजदूरों को दी जा रही जंगल की बेशकीमती लकड़ी

(निर्जेश मिश्र)
सावधान इण्डिया न्यूज, पलियाकलां-खीरी। मित्रों यह नजारा देखकर आप समझ तो गये ही होंगे कि यह बेशकीमती लकड़ी जंगल से लाई जा रही है। इतना मैं बता देता हूं कि यह लकड़ी और किसी जंगल से नहीं बल्कि दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र से लाई जा रही है। जब इन लोगों से जानकारी ली गयी तो सुनकर एक झटका सा लगा। साईकिल से लकड़ी लेकर आ रहे इन लोगों का कहना था कि हम लोग मजदूरी पर दुधवा के जंगल में झाड़ी-झंकाड़ साफ करने का काम करते हैं। जब पूछा गया कि जंगल से यह लकड़ी क्यों लेकर आ रहे हो तो जवाब मिला कि हम लोगों को मजदूरी के पैसे न देकर लकड़ी दी जाती है। जिसे बेंचकर हम लोग अपना-अपना परिवार चलाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि एक केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि सभी मजदूरों को सफाई करने के बदले लकड़ी ही दी जा रही है। वह लोग काफी दिनों से जंगल में काम कर रहे हैं। मित्रों अब सोचने की बात यह है कि इन लोगों को मजदूरी के पैसे देने की बजाय जंगल की बेशकीमती लकड़ी क्यों और कैसे दे दी जाती है। क्या सरकार ने वन विभाग के अधिकारी कर्मचारियों को जंगल की सुरक्षा करने के साथ-साथ मालिकाना हक भी दे दिया है ? बता दें कि जंगल से लाई हुई यह लकड़ी ये मजदूर लोग सात से आठ सौ रुपये में बेंचते हैं। तो सोचिए कि जंगल का कितना नुकसान होता होगा और अब तक दुधवा के जंगल से कितनी लकड़ी आ चुकी होगी, इसका अन्दाजा भी लगाना मुश्किल होगा। यही लकड़ी यदि कोई गरीब आदमी जलाने के लिए लाता है, तो उसे पकड़कर जुर्माना वसूल किया जाता है। इस सम्बन्ध में दुधवा के उपनिदेशक से जानकारी लेने के लिए फोन किया गया तो उन्होंने बताया कि आज वह नहीं मिल पाएंगे, कल बात करेंगे। दूसरे दिन फोन किया गया तो उन्होंने बताया कि आज वह परिवार के साथ हैं कल बात करेंगे। कुल मिलाकर दुधवा के अधिकारी/कर्मचारी मीडिया से कोई बात करना ही नहीं चाहते।







